द्यौस; देवा, देउस , टिर : बहुल देवता, एक द्यौस पिता

द्यौस; देवा, देउस , टिर : बहुल देवता, एक द्यौस पिता

हमारे पौराणिक साहित्य में इन्डो-यूरोपियन परम्पराओं
के पूजनीय द्यौस पिता की मुख्यता के बावजूद उनके देवत्व को ठीक से समझा नहीं जाता। आप अन्य लोगों को उनके बारे में कई बेतुकि बातें एवं झूठी निन्दा करते हुए पाएंगे। उन झूठो में सबसे सामान्य यह कि द्यौस पिता किसी तरीके से लुप्त हो गये और उनके पद को अन्य देवों ने धारण कर लिया, या किसी और परमपरा की में पूजित अन्य देवता ही विशुद्ध रूप से द्यौस पिता हैं। कदाचित आप कुछ विचित्र प्रयत्न देखेंगे जिनमें अनुपयुक्त विधियों से द्यौस पिता के स्वरूप पर निर्णय लिया गया है, जैसा कि अभी एक हाल ही में प्रकाशित पुस्तक मे देखा गया जहां थौर को द्यौस पिता ठहराया गया।

पूजनीय द्यौस पिता की योग्यता इन असत्य निष्कर्षो से अनन्त एवं असीम सत्यों में अधिक है। देवोपासना में सत्य की आवश्यकता है, इसलिए हम अब कुछ अनैतिक टिप्पणियों का खण्डन करेंगे ताकि हम द्यौस पिता के अपार रूपों के साथ इन्डो-यूरोपियन परमपराओं के धार्मिक सिद्धांतो का तात्पर्य समझ पाएं।

इन बातों का ध्यान रखते हुए अब हम भाषा अध्ययन संबंधी दो सामान्तर रेखाओं का विश्लेषण करेंगे – द्यौस पिता ( द्यौस का अर्थ स्वर्ग, दीप्तिमान गगन) और “God”/गॉड (गॉड का अर्थ “shining one”/ उज्ज्वलित, प्रज्जवलित,प्रकाशमान) [देवताओं के दर्शन अन्य अवधारणाओं के माध्यम से किये जा सकतें हैं पर हम इसकि चर्चा बाद में करेंगे] के लिये इन्डो-यूरोपियन परम्पराओं में जो शब्द प्रचलित हैं।

शब्द व्युत्पत्ति के दृष्टिकोण से इन दोनो शब्दों कि एक सामान्य धातु है – प्रोटो इन्डो-यूरोपियन “Dyew”/”द्यु” ( ‘उज्ज्वलित/ दीप्तिमान गगन/ स्वर्ग’ – ‘कान्तिमान अरुणोदय आकाश); लेकिन केन्द्रीय धातु से उत्पन्न पहले दो शब्द रूपों ने – PIE ‘Dyews’/’घुस’ (द्यौस पिता और उनका पद) और PIE ‘Deywos’/’देवोस’ (गॉड/भगवान का साधारण अर्थ – उज्ज्वलित, प्रज्जवलित,प्रकाशमान) पुरातन काल में ही विभिन्न अर्थ अपना लिये थे। यह विशिष्टता अन्य इन्डो-यूरोपियन भाषाओं तथा परम्पराओं में कायम रही।

यह निष्कर्ष ही सबसे स्पष्ट है – बहुल देवता भले ही हो (‘देवा’, ‘देउस’/’दे’, ‘टिर’/ ‘टिवार’) पर द्यौस पिता एक ही हैं। [हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि द्यौस पिता हर इन्डो-यूरोपियन परम्परा द्वारा पूजित देव समूह में अन्य रूपों, मुखों तथा छवियों में प्रकट होते हैं]

यह सिद्धांत गलत निर्णयों का खण्डन करने के लिए हमारे लिये महत्वपूर्ण क्यों हैं? इसलिए क्योंकि कुछ ‘सज्जनों का कहना है कि टिर ही किसी तरीके से वास्तविक जर्मानिक/नॉर्स पुराणों के द्यौस पिता है – उनके अनुमान से ओडिन एक नूतन परिवर्धन है। हम आने वाले निबन्धों में देखेंगे कि इन्डो-यूरोपियन पौराणिक परम्पराओं के तुलनात्मक अध्ययन से यही सिद्ध होता कि ओडिन ही द्यौस पिता है, अभी हम भाषा अध्ययन पर ही चिन्तन करेंगे। इसलिए क्योंकि भाषा अध्ययन के दृष्टिकोण में अलगाव के कारण ही कई समस्याएं तथा जल्प के विषय खड़े हो गए हैं।

लोगों ने भ्रामक अनुमान कर लिया है कि टिर ध्वन्यात्मक, कार्यात्मक, भाषानात्मक एवं पोराणिक रूपों में ‘ज़्यूस’/’द्यौस’ के स्वरूप हैं। चार्ट में देखा जा सकता है कि ऐसा नहीं है, टिर का अर्थ द्यौस पिता नहीं होता, टिर का अभिप्राय होता है देव/गॉड। अगर टिर का उपयोग प्रत्यय के रूप में हो तब यह एक देव/ गॉड के कार्यात्मक रूप की ओर संकेत करता है, यानी ” the God of/ इसके देवता “। लैटिन ‘देउस’ भी इसि प्रकार से उपयोग किया जा सकता है, पर रोमन धर्म में देवताओं के नामों का स्पष्ट रूप से उपयोग होता है (Direct invocation instead of Indirect invocation)।

ऐसा इसलिए क्योंकि इसकि व्युत्पत्ति PIE ‘Deywos’/’देवोस’ तथा PIE ‘Dyews’/’घूस’ से होती है।

ओडिन के अन्य नामों में भी ‘टिर’ का उपयोग होता है, उदाहरण: ‘Sigtyr’/’सिगटिर’ – God of Victory/विजय के देवता;
‘Hangatyr’/’हान्गाटिर’ – God of the Hanged/ फांसी द्वारा मारे गए लोगों के देवता;
‘Valtyr’/’वाल्टिर’- God of the Slain/मारे गए लोगों के देवता; ‘Geirtyr’/’गियरटिर’ – the Spear God/ शूल देवता
थौर के नामों में भी ‘टिर’ का उपयोग होता है:
‘Reidhartyr’/”राइडहारटिर’- The Chariot God/ रथ देवता;
और अन्य नाम भी मिलतें हैं Thorsdrapa/ थौरसडापा में Tivi/टिवि के अन्तर्गत और उसके बहुवचन Tivar/’देवता'(The Gods)।

यह सन्सकृत में ‘देव’ के प्रयोग के समान है: उदाहरण – महादेव, वायुदेव, अग्निदेव, यह शब्द बस इन्द्र देव के लिए भी प्रयोग किया जाता है और हम इसका बहुवचन उपयोग भी पाते हैं।

भाषा अध्ययन के विषयों को जानबूझकर आसानी से समझाया गया है। इसलिए उपर्युक्त चार्ट में शब्दों के । मध्यवर्ति रूप को नहीं व्यक्त किया गया है ( पौराणिक लैटिन – देवोस, जो धुस का पुराना रूप है और खुद प्रोटो इटालिक (Italic) – देयवोस से उत्पन्न होता है)। कुछ भाषानात्मक अवधारणाओं को भी छोटा किया गया है (प्रोटो हेलेनिक ‘Dzeus’/’द्ज़ेयुस’ का अर्थ पूर्ण प्रकार से स्वर्ग नहीं होता, पर प्रोटो इटालिक ‘द्जूस’ एवं प्रोटो इन्डो-आर्यन ‘द्यौस’ का अर्थ स्वर्ग होता है)। कुछ अवधारणाओं का कोई भी उल्लेख नहीं है, जैसे सन्सकृत ‘देवा’, नॉरडिक ‘टिर’, एवं अन्य शब्द जो PIE दिव्योस से उत्पन्न होते हैं वो कभी-कभी कुछ मनुष्यों (जो महात्मा हैं, तथा अपनी भक्ति में किसी भगवान के गुण व्यक्त करते हैं) के लिए भी उपयोग किए जाते हैं। सन्सकृत ‘धु’, जो स्वर्गलोक के असीम उजाले को व्यक्त करता है उसे भी इधर समझाया नहीं गया है। समय तथा स्थान की कमी के कारण इन सारे विषयों को समझाया नहीं गया है।

अंत में यह स्पष्ट है कि टिर * द्यौस/ ज़्यूस/ जुपिटर। टिर का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में, अधिक तरीकों से होता है। अगर उसके मूल धातु PIE ‘Deywos’/देवोस की कुछ समानता PIE ‘Dyews’/घूस के साथ है भी तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे एकाकार हैं। इसका विपरीत ही सत्य है, क्योंकि वे PIE में भी भिन्न है इसलिए उनके अर्थ भी भिन्न है।

भाषा अध्ययन के हर प्रमाण के अनुसार टिर (एकवचन/ singular रूप में) को द्यौस पिता नहीं कहा जा सकता है।

अगले निबंध में इन्डो-यूरोपियन परम्पराओं के पौराणिक तुलना से दिखाया जाएगा कि ओडिन ही द्यौस पिता है,
और उन्होंने ने टिर को विस्थापित नहीं किया है।

The original format of this article, in (mostly) English, can be found here. Our enormous thanks to the translator.

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